प्रशासन का वह खलनायक जिसे जनता मानती है अपना नायक

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अशफांक खां की रिपोर्ट


बहराइचः
अति आक्रामकता और हिंसा राजनीति के कैरियर में कितनी घातक साबित हो सकती है इसका उदाहरण शायद बहराइच के पूर्व विधायक दिलीप कुमार वर्मा से बेहतर दूसरा ना मिले । अपने समर्थकों के छोटे-छोटे मामलों को लेकर दिलीप वर्मा का प्रशासन के लोगों से संघर्ष करना यह बताता है कि दिलीप वर्मा जमीन से कितना जुड़े रहते हैं । जनता की समस्याओं को लेकर अनवरत जूझता यह नेता कभी कभार इतना आक्रोशित हो जाता है कि वह अपनी मर्यादा की सीमा लांघ जाता है । जिसके कारण एक तरफ उसे कानून तोड़ने के एवज में कारागार की कालकोठरी मिलती है तो वहीं दूसरी तरफ जनता का प्यार भी कम नहीं होता । ऐसी ही गतिविधियों के कारण पूर्व विधायक दिलीप वर्मा लंबे समय से जिला प्रशासन की नज़रों में खलनायक बने हुए हैं मगर फिर भी  उनको नायक मानने वालों की संख्या भी कम नहीं है । बीते 16 नवंबर को पूर्व विधायक दिलीप वर्मा पर तहसीलदार नानपारा की कथित तौर पर मारपीट करने व  उसके अगले दिन सीओ नानपारा के साथ अभद्रता करने के आरोप में पुलिस ने नाटकीय घटनाक्रम के बाद आखिरकार पूर्व विधायक को जेल भेज दिया । दिलीप का प्रशासनिक अधिकारियों के साथ ऐसा बर्ताव वाकई शर्मनाक है और  उससे ज्यादा शर्मनाक खुद नानपारा प्रशासन की करतूत है । जिसके कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई । घटना को लेकर मीडिया रिपोर्टों में दिलीप वर्मा को खलनायक बनाने की ऐसी होड़ मची कि मामले के कई पहलुओं पर नजर ही नहीं पड़ी । एक तहसीलदार का एसडीएम की गाड़ी में घूमना फिर उसे सही साबित करने के लिए उत्तेजना फैलाने वाले तर्क देना , इसके साथ ही पूर्व विधायक का सीओ नानपारा पर गंभीर आरोप लगाना यह सब दिलीप को खलनायक बनाने के शोर में दब सा गया । कुछ मीडिया रिपोर्ट्स दिलीप को गुंडा सड़क छाप नेता यहां तक कि उसकी हैसियत गली में पोस्टर लगाने वाले छुट भैया नेता तक बता दिया । जिले के राजनीतिक पंडित इस कथित सड़क छाप नेता के बारे में बताते हैं कि उसने प्रत्यक्ष रूप से 15 साल तक विधानसभा की गलियों में चहल कदमी की है और 10 वर्षों से अप्रत्यक्ष तौर पर नानपारा विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर रहा है ।दिलीप वर्मा के कुल राजनीतिक कार्यकाल की बात करें तो वह जिले के एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्हें जनता ने इतने लंबे समय से अपना रहनुमा चुनती आई है । फिर चाहे पार्टी सपा हो ,कांग्रेस हो , या फिर भाजपा क्षेत्र की जनता ने हमेशा पार्टी एजेंडे से दिलीप की शख्सियत को ही तरजीह दी है । ऐसे में दिलीप वर्मा के राजनीतिक कद को किसी भी तर्क से झुठलाया  नहीं जा सकता । हाँ उनके  आचरण की आलोचना जरूर होनी चाहिए । रामराज के ऐसे शासन में जहां सत्ता की बागडोर नौकरशाहों को सौंप दी गई हो , जहाँ प्रशासन खुद को शासक समझने लगा हो , ऐसे माहौल में जब दूसरे जनप्रतिनिधियों की घिघी बंध गई हो या फिर विधायक प्रशासन से अपनी इज्जत बचाते हुए खामोश बैठ जाएं उस दौर में किसी नेता का प्रशासन के विरुद्ध आवाज उठाना लोकतांत्रिक हितों के लिए जरूरी है बशर्ते प्रशासन के खिलाफ उठने वाली आवाज संयमशील व विधि अनुरूप हो ।  बीते वर्षों में बहराइच प्रशासन ने अपनी तानाशाही रवैया के चलते कई जनप्रतिनिधियों की आवाज दबाई है । जिस दलित उत्पीड़न की बात कहकर पुलिस ने पूर्व विधायक दिलीप वर्मा को सलाखों के पीछे भेज दिया है ।  कुछ समय पहले ऐसे ही एक दलित उत्पीड़न का आरोप एक पुलिस अधिकारी पर लगे थे उस पर कार्रवाई की मांग को लेकर बीजेपी की दलित सांसद सावित्री बाई फुले ने धरना तक दिया मगर कार्रवाई का नतीजा सिफर रहा । इसी महिला सांसद ने स्वास्थ्य सेवाओं से असंतुष्ट हो जिला चिकित्सालय परिसर में वर्तमान मुख्य चिकित्सा अधीक्षक को हटाने की मांग करते हुए धरना दिया था मगर यहां भी कार्रवाई शून्य रही ।जिले की बलहा विधानसभा से विधायक अक्षयबर लाल गौड़ के बारे में प्रचलित है कि उनका व्यवहार बड़ा शालीन रहता है ।अपने क्षेत्र की जन समस्या का समाधान करने को लेकर बलहा विधायक ने एक अधिकारी से कई बार गुहार लगाई  पर जब कार्रवाई नहीं हुई तो विधायक को मजबूरन तहसील दिवस में आम जनता की कतार में खड़े होकर जिले के आला अधिकारियों को समस्या से अवगत कराना पड़ा । इस घटनाक्रम को बताने का मकसद केवल इतना है कि आप किसी नेता के बारे में अपनी धारणा बनाने से पूर्व बहराइच प्रशासन  का चरित्र जरूर परख लें क्योंकि यहां ऐसे प्रशासक हैं जो सत्ता के विधायक को सरकारी गेस्ट हाउस में एक ग्लास पानी दिए बिना ही वापस भेज देते हैं । ऐसे में जरूरी है कि प्रदेश सरकार इन घटना क्रमों को संज्ञान में लेकर ऐसा वातावरण पैदा करें  जिस से नौकरशाहों व जनप्रतिनिधियों में आपसी सामंजस्य बन सके ।

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Source: INDIA NEWS CENTRE

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