सोलह साल बाद मिला पत्नी को इंसाफ,लापता सैनिक की पत्नी को एक लाख जुर्माने के साथ मिली पेंशन

Sixteen years later, wife got justice, wife of missing soldier got pension with one lakh fine share via Whatsapp

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“अंतिम-आदमी” के साथ अमानवीय व्यवहार, व्यवस्था की जीवन शैली बन चुका है: विजय कुमार पाण्डेय

 
रिपोर्ट अशफांक खा
लखनऊः
सेना कोर्ट लखनऊ ने 16 वर्ष से लापता सैनिक की पत्नी को एक लाख रुपए जुर्माने के साथ पेंशन देते हुए जिम्मेदार अधिकारी की तनख्वाह से जुर्माने की राशि काटने का आदेश सुनाया, प्रकरण यह था कि श्रीमती बिट्टन देवी के पति गनर राजेश कुमार आर्टिलरी रेजिमेंट में 11 अगस्त 1995 को भर्ती हुए थे, 5 मार्च 2003 को आर्टिलरी स्कूल देवलाली से पीड़िता के पति सेना की डियूटी से लापता हो गए और उन्हें तीन साल बाद 20 अप्रैल 2006 को भगोड़ा घोषित करके सेना की धारा 20 (3) के तहत सेना से बर्खास्त कर दिया गया। श्रीमती बिट्टन देवी ने सेना के जिम्मेदार अधिकारियों को कई पत्र दिए लेकिन कोई कार्यवाही न होते देख अपने पति की गुमशुदगी की रिपोर्ट 13 अगस्त 2006 को फर्रुखाबाद जिले के कायमगंज थाने में दर्ज कराई लेकिन पुलिस ने अमानवीयता का रुख अपनाते हुए लापता सैनिक की पत्नी के मामले में एफआईआर न दर्ज करके शिकायत के रूप में दर्ज किया और न ही कोई संतोषजनक कार्यवाही की जिसके सन्दर्भ में पीडिता ने पुलिस अधीक्षक फर्रुखाबाद के सामने भी गुहार लगाई लेकिन “आपकी सेवा में तत्पर” का संदेश देने वाली पुलिस ने कुछ भी नहीं किया और जबकि यह सेना का दायित्व था कि वह अपने लापता सैनिक की गुमशुदगी दर्ज कराती लेकिन उसने भी अपनी जवाबदेही नहीं निभाई और पीड़िता को न्याय देने के बजाय उसे इधर से उधर दौड़ाती रही। पीड़िता के अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय ने पीड़िता के साथ खड़े होने का फैसला लेते हुए सेना कोर्ट लखनऊ में मुकदमा दायर किया और न्यायालय के समक्ष भारत सरकार के अधिवक्ता के भारी विरोध के बावजूद, मजबूती से पीडिता पत्नी का पक्ष रखते हुए दलील दी कि भारत सरकार रक्षा-मंत्रालय की 1988 की पॉलिसी और उसमें किए गए वर्ष 2013 और 2014 में संशोधन, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा-108 और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय एल० आई० सी० बनाम अनुराधा (2004) 10 एससीसी 131 के अनुसार पीड़िता के पति को सात साल बाद मृत मानकर लापता की तिथि से पीड़ित पत्नी को पेंशन दी जानी चाहिए थी लेकिन ऐसा न करके भारत सरकार ने गलत किया, जिसे सेना कोर्ट के न्यायमूर्ति एस वी एस राठौर और बीबीपी सिंहा की खंडपीठ ने स्वीकार किया और सरकार के इस रवैये पर सख्त रुख अपनाते हुए एक लाख के जुर्माने के साथ पीडिता को पेंशन देने का आदेश दिया और साथ में यह भी कहा कि यदि चार महीने के अंदर सरकार निर्णय का अनुपालन नहीं करती तो उसको 9% व्याज भी बतौर जुर्माना देना होगा। पीड़िता के अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय ने कहा कि कतार के "अंतिम-आदमी" को जिस प्रकार से 16 वर्षों से पति के लापता होने के बावजूद उसके अधिकार के लिए उसे सेना और पुलिस द्वारा दौड़ाया गया काफी दुःखद है क्योंकि ऐसी घटनाएँ तो उन लोगों के साथ भी घटित हो सकती है, जिन्होंने पद के अनुरूप व्यवहार न करते हुए अमानवीय रुख अख्तियार किया, और उनका परिवार भी इसी परम्परा का शिकार होगा । विजय पाण्डेय ने आगे कहा कि न्याय की सर्वाधिक आवश्यकता कतार के अंतिम-आदमी को है लेकिन उसके पास आर्थिक तंगी होने के कारण वह अपने अधिकार के लिए संघर्ष नहीं कर पाता ऐसे में अधिवक्ता समाज का दायित्व बनता है कि वह ऐसे लोगों के साथ खड़ा हो और उनको हक दिलाए। विजय कुमार पाण्डेय ने कहा कि सेना कोर्ट की खण्ड-पीठ का यह निर्णय ऐतिहासिक है इससे अन्य पीड़ितों को भी न्याय मिल सकेगाऔर उन्होंने उच्च पदों पर बैठे लोगों से अपील की कि, ऐसे मामलों में जहाँ “अंतिम-आदमी” संवेदनशील घटनाओं का शिकार हो कम से कम, मानवता के आधार पर ही सही लेकिन अपने उत्तरदायित्व का बखूबी पालन किया जाना जरूरी हो जाता है और उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामले में इतने लम्बे समय तक देश की सेवा में तत्पर सैनिक की पत्नी को जलालत की जिन्दगी जिनकी वजह से जीने को मजबूर हुई, उनके खिलाफ कठोर कार्यवाही की भी जरूरत है और उसे सार्वजनिक किए जाने की भी आवश्यकता है क्योंकि दण्ड से अधिक आवश्यक है दण्ड का भय l 

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Source: INDIA NEWS CENTRE

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