पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आरएसएस को दिया देशभक्ति का संदेश,बोले भारत की पहचान एकता और सहिष्णुता में है

Former President Pranab Mukherjee's message of patriotism given to RSS, share via Whatsapp

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नेशनल डेस्कः
पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने सहिष्णुता, एकता तथा विविधता को भारत की सबसे बड़ी पहचान बताते हुए कहा कि हमें ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना है जहां लोगों के भीतर डर भय न हों और सब एकजुट होकर देश की तरक्की के लिए काम करें। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि अगर हम राष्ट्रीयता को असहिष्णुता के रूप में परिभाषित करने की कोशिश करेंगे तो हमारी पहचान धुंधली हो जाएगी क्योंकि यह बहुलवाद का उत्सव मनाने वाली भूमि है। वह बृहस्पतिवार को यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संघ शिक्षा वर्ग (तृतीय वर्ष) के समापन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। कांग्रेसियों के जबरदस्त विरोध के बीच इस कार्यक्रम में पहुंचे वरिष्ठ राजनेता मुखर्जी ने कहा कि राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। आधुनिक भारत के निर्माता पंडित नेहरू ने भी सबको मिलकर साथ रहने और आगे बढने की शिक्षा दी है। पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि भारत के राष्ट्रवाद में वैश्विकता की भावना है। हमने दुनिया को वसुधैव कुटुंबकम का मंत्र दिया है। हमारे राष्ट्रवाद में पूरी दुनिया के सुख की कामना की गयी है। भारत हमेशा एक खुली सोच का समाज रहा है और इसका प्रमाण हमारे धर्मग्रंथ और हमारी संस्कृति में है। उन्होंने कहा कि यही वजह है कि 5000 साल से कोई हमारी एकता को नहीं तोड पाया। यूरोप से बहुत पहले ही हम राष्ट्र के रूप में स्थापित हो चुके थे और हमारा राष्ट्रवाद उनकी तरह संकुचित नहीं था। यूरोपीय राष्ट्रवाद साझा दुश्मन की अवधारणा पर आधारित है, लेकिन ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की विचारधारा वाले भारत ने पूरी दुनिया को अपना परिवार माना। प्राचीन काल में भारत आने वाले सभी यात्रियों ने इसकी प्रशासनिक दक्षता, ढांचागत सुविधा और व्यवस्थित शहरों की तारीफ की है। मुखर्जी ने कहा कि इस देश में इतनी विविधता है कि कई बार हैरानी होती है। यहां 122 भाषाएं हैं, 1600 से ज्यादा बोलियां हैं, सात मुख्य धर्म हैं और तीन जातीय समूह हैं लेकिन यही विविधता ही हमारी असली ताकत है। यह हमें पूरी दुनिया में विशिष्ट बनाता है। हमारी राष्ट्रीयता किसी धर्म या जाति से बंधी हुई नहीं है। हम सहनशीलता, सम्मान और अनेकता के कारण खुद को ताकतवर महसूस करते हैं। हम अपने इस बहुलवाद का उत्सव मनाते हैं। पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि समाज और देश को आगे ले जाने के लिए बातचीत बहुत जरूरी है। बिना संवाद के लोकतंत्र नहीं चल सकता है। हमें बांटने वाले विचारों की पहचान करनी होगी। हो सकता है कि हम दूसरों से सहमत हो और नहीं भी हों लेकिन किसी भी सूरत में विचारों की विविधता और बहुलता को नहीं नकार सकते हैं।

खुशहाली में पीछे क्यों

मुखर्जी ने सवाल उठाया कि आर्थिक मोर्चे पर शानदार उपलब्धियां हासिल करने के बावजूद खुशहाली सूचकांक (हैपीनेस इंडेक्स) में हम 133वें नंबर पर क्यों हैं। इस मामले में प्रगति करने के लिए हमें कौटिल्य को याद करना चाहिए, जिनका एक संदेश संसद के गेट नंबर छह पर लिखा है। इसमें कहा गया है कि जनता की खुशी में ही राजा की खुशी है। विदेशी शासन के कारण लंबे समय तक हम दर्द में जिए हैं, लेकिन अब हमें शांति, सौहार्द्र और खुशी फैलाने के लिए संघर्ष करना चाहिए।

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Source: INDIA NEWS CENTRE

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